Friday, October 14, 2016

शायर अल्फ़ाज़ों का मदारी



तमाशा हूँ या सच का सौदागर हूँ
आम लोग मुझे पागल समझते है
और ज़हीन लोग शायर
फिर गौर नहीं करते
मैं शायर हूँ ...
मैं शायर हूँ जो खेल दिखाता है अल्फ़ाज़ों का
मेरे लफ़्ज़ खेलते है जज़्बातों की रस्सियों पर
कलाबाज़ी दिखाते है एहसासों की
हर्फ़ हर्फ़ खूबसूरती से
एक एक लफ़्ज़ इजात होता है
क़ैद में होता है अशआरों की
मगर आज़ाद होता है
हर दर्द पर
वाह वाह
की ताली बजती है
कभी समझकर
कभी खली बजती है
बहुत ग़ुरूर में होता हूँ
टोपी झुकाकर पैसे भी नहीं माँगता
और मांग भी नहीं सकता
ये खेल मुफ्त है
आम लोगो के लिए
और
खास लोगों के लिए भी
खली जेब मैं बोहोत कुछ बाँट लेता हूँ

मैं शेयर हूँ
जो खेल दिखता है अल्फ़ाज़ों का..