Saturday, July 23, 2016

शिक़वे (Complaints)



कैसे रखु हिसाब इन शिकवों का
मेरी उम्र से कई ज़्यादा इज़ाफ़ा होता है इनमे
ऐसा लगता हैं
ये मिट्टी है मेरे ऊपर
और मैं दफ़्न हूँ इनके निचे
मेरी ज़मीन में गहराई नहीं बढ़ रही
ऊपर की मिट्टी बढ़ती जा रही हैं
कोशिशे रोज़ होती हैं उभरने की मेरी
कुछ सिख कर, कुछ हालातो को ठीक कर
फिर मज़ाक बन जाता हैं
कुछ गिले खुलते हैं मुझपर
थोडा और मिट्टी में इज़ाफ़ा होता हैं ...

Thursday, July 21, 2016

शाम (Eve)



दिन से बिछड़ती हुई रात से मिलती हूँ
दिन कहता हैं रात का अँधेरा तुझे निगलता हैं
रात कहती हैं ये दिन मुआ मुझसें जलता हैं
दोनों का इश्क़ मुझमें ढलता हैं
मैं रंग बदलते आसमाँ की छठा हूँ
घर लौटती लहरों का कोहराम हूँ
मैं शाम हूँ
जब चीरती तेज़ किरनों से दूर हो जाती हूँ
मैं खिल कर कई चेहरों का नूर हो जाती हूँ
खुशियाँ ले आती हूँ दामन में
रोज़ आना फितरत सी हैं
क्या कहूँ यह कुदरत ही हैं
मशहूर नहीं मैं आम हूँ
मैं शाम हूँ
एक सायें में मेरे कई पहलु छिपते हैं
मोहोब्बत और ग़म बच्चों जैसे लिपटे हैं
ले आई संग
किसी दिल तक प्यार
और
कहीं हिज्र का पैग़ाम हूँ
मैं शाम हूँ ..

Monday, July 18, 2016

रूह (Soul)




किस रूह को पकडे है ये जिस्म
उस रूह को जो इससे लिपटकर
कई मुर्दा जिस्मो की पाक रूह से इश्क़ निभाती हैं
रूह की दुनिया एक आज़ाद दुनिया हैं
इक वो दुनिया
जहाँ सिकंदर खुद को ग़ालिब से छोटा महसूस करता हैं
इक वो दुनिया
जहाँ मीर को कोई पागल नहीं कहता
और ना ही ग़ालिब को बदख्वार
मैं भी इसी दुनिया का हूँ बस थोड़े ही दिनों के लिए इस जिस्म का ग़ुलाम हूँ
इससे छुटकारा मिलने पर सबसे पहले
रुबरु होना हैं
उस रूह से
जिस की आवाज़ ने कई बार पलकों के निचे इक समुन्दर पकड़ रखा हैं
जग्जितजी को भी तो पता चले की उनके सुरों ने कितनी गहराई का दरिया एक आँख में सिमटा दिया
उस समुन्दर को लिए कई जिस्म अभी कतार में हैं
रूह की कोई हद्द नहीं
फिर वो चल पड़ेंगी डूबने
उस मीर से हो कर ग़ालिब से निकल फानी से बहते हुऐ
मुज़फ्फर में तैरते हुऐ
उस साग़र~ओ~मीना में डूबकर फैज़ पाते हुऐ
बस चलती चली जाएंगी बिना किसी सिरे की तरह
इस्मत के किस्सों की तरह
मंटो की दास्तान की तरह
बस यह रूह जिस्म से छुटे तो ...