Thursday, July 21, 2016

शाम (Eve)



दिन से बिछड़ती हुई रात से मिलती हूँ
दिन कहता हैं रात का अँधेरा तुझे निगलता हैं
रात कहती हैं ये दिन मुआ मुझसें जलता हैं
दोनों का इश्क़ मुझमें ढलता हैं
मैं रंग बदलते आसमाँ की छठा हूँ
घर लौटती लहरों का कोहराम हूँ
मैं शाम हूँ
जब चीरती तेज़ किरनों से दूर हो जाती हूँ
मैं खिल कर कई चेहरों का नूर हो जाती हूँ
खुशियाँ ले आती हूँ दामन में
रोज़ आना फितरत सी हैं
क्या कहूँ यह कुदरत ही हैं
मशहूर नहीं मैं आम हूँ
मैं शाम हूँ
एक सायें में मेरे कई पहलु छिपते हैं
मोहोब्बत और ग़म बच्चों जैसे लिपटे हैं
ले आई संग
किसी दिल तक प्यार
और
कहीं हिज्र का पैग़ाम हूँ
मैं शाम हूँ ..

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