Monday, July 18, 2016

रूह (Soul)




किस रूह को पकडे है ये जिस्म
उस रूह को जो इससे लिपटकर
कई मुर्दा जिस्मो की पाक रूह से इश्क़ निभाती हैं
रूह की दुनिया एक आज़ाद दुनिया हैं
इक वो दुनिया
जहाँ सिकंदर खुद को ग़ालिब से छोटा महसूस करता हैं
इक वो दुनिया
जहाँ मीर को कोई पागल नहीं कहता
और ना ही ग़ालिब को बदख्वार
मैं भी इसी दुनिया का हूँ बस थोड़े ही दिनों के लिए इस जिस्म का ग़ुलाम हूँ
इससे छुटकारा मिलने पर सबसे पहले
रुबरु होना हैं
उस रूह से
जिस की आवाज़ ने कई बार पलकों के निचे इक समुन्दर पकड़ रखा हैं
जग्जितजी को भी तो पता चले की उनके सुरों ने कितनी गहराई का दरिया एक आँख में सिमटा दिया
उस समुन्दर को लिए कई जिस्म अभी कतार में हैं
रूह की कोई हद्द नहीं
फिर वो चल पड़ेंगी डूबने
उस मीर से हो कर ग़ालिब से निकल फानी से बहते हुऐ
मुज़फ्फर में तैरते हुऐ
उस साग़र~ओ~मीना में डूबकर फैज़ पाते हुऐ
बस चलती चली जाएंगी बिना किसी सिरे की तरह
इस्मत के किस्सों की तरह
मंटो की दास्तान की तरह
बस यह रूह जिस्म से छुटे तो ...



No comments:

Post a Comment