Friday, October 14, 2016

शायर अल्फ़ाज़ों का मदारी



तमाशा हूँ या सच का सौदागर हूँ
आम लोग मुझे पागल समझते है
और ज़हीन लोग शायर
फिर गौर नहीं करते
मैं शायर हूँ ...
मैं शायर हूँ जो खेल दिखाता है अल्फ़ाज़ों का
मेरे लफ़्ज़ खेलते है जज़्बातों की रस्सियों पर
कलाबाज़ी दिखाते है एहसासों की
हर्फ़ हर्फ़ खूबसूरती से
एक एक लफ़्ज़ इजात होता है
क़ैद में होता है अशआरों की
मगर आज़ाद होता है
हर दर्द पर
वाह वाह
की ताली बजती है
कभी समझकर
कभी खली बजती है
बहुत ग़ुरूर में होता हूँ
टोपी झुकाकर पैसे भी नहीं माँगता
और मांग भी नहीं सकता
ये खेल मुफ्त है
आम लोगो के लिए
और
खास लोगों के लिए भी
खली जेब मैं बोहोत कुछ बाँट लेता हूँ

मैं शेयर हूँ
जो खेल दिखता है अल्फ़ाज़ों का..


Tuesday, September 27, 2016

तनहाई




सालों से इक तरफ़ा इश्क़ है मुझसे उसे
हरदम साथ रहती है साये की तरह
अब ये वादा है तन्हाई तुझसे
तेरा इश्क़ अब इक तरफ़ा न रहेंगा..
सच अब टूट कर मोहोब्बत होंगी
सच अब झूठ पर मोहोब्बत होंगी
आँखे मेरी होंगी आँसू तेरा बहेगा
तेरा इश्क़ अब इक तरफ़ा न रहेंगा ..
तू रोज़ नया लिबास पहनकर आती है
ख़ुबसुरत और खास बनकर आती है
रोज़ दर बदलते है आने के तेरे
रोज़ तू चारासाज़ बनकर आती है
कभी दिल ढूंढता था बहाने जाने के तेरे
वादा है इक और तुझसे
दिल, ग़म, दर्द, याद
ऐसा कोई चर्चा न रहेंगा
तेरा इश्क़ अब इक तरफ़ा न रहेंगा..
तुझसी कोई जहां में वफ़ा क्या करे
ज़ख्म से इश्क़ हो तो दवा क्या करे..


Monday, August 8, 2016

तुम और WhatsApp ..



हाँ waiting पर है कुछ एहसास भरे लफ्ज़
ज़रा check भी कर लिया करो
हमेशा तुम्हारे एक जवाब पर चार उम्मीदों के सवाल और रख लिए जाते हैं
मज़ाक में ही सही .. और कभी तुम किसी एक का जवाब देकर टाल जाते हो
नज़रे बार बार Last Seen का Scene देखा करती है
मसरूफ़ रहना भी कोई तुम से सीखें
जब वो दो √ के निशान नीले हो जाते है
और कोई जवाब नहीं
दिल बेचैन हो उठता हैं
अजीब अजीब सवाल टकराते है आपस में ज़हन की चार दीवारी से
और जब online होकर भी कोई reply नहीं आता
तो फिर ग़ुस्सा आता हैं
यूँ जी में आता है सारे शैतान चेहरे वाले smiley भेज दू
फिर एक नज़र होकर गुज़रती है उस profile pic से
सारे गिले-शिकवे ठन्डे हो जाते है
कितनी प्यारी तस्वीर हैं
देखो दुनिया बदले मगर इसे न बदलना....

Tuesday, August 2, 2016

तू नहीं जो अब ...



तू नहीं जो अब
तारों से भरा आसमां खाली नज़र आता है
हवा तेज़ी से गुज़रती है मगर
उसका मुझे छुना कुछ महसुस नहीं कराता
अब डर नहीं लगता
जो डर तुझे खोने का था तू साथ ले गया है
ज़मीं पर कोई रास्ता हक़ीक़त नहीं लगता
जहाँ से शुरू किया था चलना कभी
वही आकर क़दम ठहर जाते है
नींद आँखों में नहीं
और
सपने आने से पहले ही सो जाते है
ये खिड़की पर हवा से लड़ता हुआ पर्दा
जो कभी गहरे रंग का था
फिंका नज़र आने लगा है
बरसातों में भीग जाया करता था अक्सर
अबके बारिश जो गई सब रंग ले गई
उस फिश पॉट में तैरती सी मछली
अकेली सी हो गई है
कोई साथी चला गया है उसका
चादरें बदली जाती है उस बेड की बिना वजह
कोई सोता नहीं धूल के सिवा
आराम खुर्ची बोहोत काम करने लगी है
एक ऐसे इंतज़ार में रात भर जुम्बिश करती है
जिसका कोई मुकम्मल सिरा नहीं
वक़्त तो गुज़रता है
लेकिन
वो पल यूँ ही थम गए है
तू नहीं जो अब ...

Saturday, July 23, 2016

शिक़वे (Complaints)



कैसे रखु हिसाब इन शिकवों का
मेरी उम्र से कई ज़्यादा इज़ाफ़ा होता है इनमे
ऐसा लगता हैं
ये मिट्टी है मेरे ऊपर
और मैं दफ़्न हूँ इनके निचे
मेरी ज़मीन में गहराई नहीं बढ़ रही
ऊपर की मिट्टी बढ़ती जा रही हैं
कोशिशे रोज़ होती हैं उभरने की मेरी
कुछ सिख कर, कुछ हालातो को ठीक कर
फिर मज़ाक बन जाता हैं
कुछ गिले खुलते हैं मुझपर
थोडा और मिट्टी में इज़ाफ़ा होता हैं ...

Thursday, July 21, 2016

शाम (Eve)



दिन से बिछड़ती हुई रात से मिलती हूँ
दिन कहता हैं रात का अँधेरा तुझे निगलता हैं
रात कहती हैं ये दिन मुआ मुझसें जलता हैं
दोनों का इश्क़ मुझमें ढलता हैं
मैं रंग बदलते आसमाँ की छठा हूँ
घर लौटती लहरों का कोहराम हूँ
मैं शाम हूँ
जब चीरती तेज़ किरनों से दूर हो जाती हूँ
मैं खिल कर कई चेहरों का नूर हो जाती हूँ
खुशियाँ ले आती हूँ दामन में
रोज़ आना फितरत सी हैं
क्या कहूँ यह कुदरत ही हैं
मशहूर नहीं मैं आम हूँ
मैं शाम हूँ
एक सायें में मेरे कई पहलु छिपते हैं
मोहोब्बत और ग़म बच्चों जैसे लिपटे हैं
ले आई संग
किसी दिल तक प्यार
और
कहीं हिज्र का पैग़ाम हूँ
मैं शाम हूँ ..

Monday, July 18, 2016

रूह (Soul)




किस रूह को पकडे है ये जिस्म
उस रूह को जो इससे लिपटकर
कई मुर्दा जिस्मो की पाक रूह से इश्क़ निभाती हैं
रूह की दुनिया एक आज़ाद दुनिया हैं
इक वो दुनिया
जहाँ सिकंदर खुद को ग़ालिब से छोटा महसूस करता हैं
इक वो दुनिया
जहाँ मीर को कोई पागल नहीं कहता
और ना ही ग़ालिब को बदख्वार
मैं भी इसी दुनिया का हूँ बस थोड़े ही दिनों के लिए इस जिस्म का ग़ुलाम हूँ
इससे छुटकारा मिलने पर सबसे पहले
रुबरु होना हैं
उस रूह से
जिस की आवाज़ ने कई बार पलकों के निचे इक समुन्दर पकड़ रखा हैं
जग्जितजी को भी तो पता चले की उनके सुरों ने कितनी गहराई का दरिया एक आँख में सिमटा दिया
उस समुन्दर को लिए कई जिस्म अभी कतार में हैं
रूह की कोई हद्द नहीं
फिर वो चल पड़ेंगी डूबने
उस मीर से हो कर ग़ालिब से निकल फानी से बहते हुऐ
मुज़फ्फर में तैरते हुऐ
उस साग़र~ओ~मीना में डूबकर फैज़ पाते हुऐ
बस चलती चली जाएंगी बिना किसी सिरे की तरह
इस्मत के किस्सों की तरह
मंटो की दास्तान की तरह
बस यह रूह जिस्म से छुटे तो ...